अनभिज्ञ हूँ काल से सम्बन्धित सारर्गभित बातों से , शिराज़ा है अंतस भावों और अहसासों का, कुछ ख्यालों और कल्पनाओं से राब्ता बनाए रखती हूँ जिसे शब्दों द्वारा काव्य रुप में ढालने की कोशिश....
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बुलंदी के मस्त,ताब तेवर
शतरंजी चाल चलकर ...फिर हंसे सत्त पर सवार होकर ..फिर हंसे एक होने के चाल पे,डोलकर राजा जी, सर से नख तक जाल बुनकर ..फिर हंसे। घुम घाम कर वही...
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कई दिनों बाद ...थोड़ी सी सुकून और कलम...गानें के साथ हालत ये मेरे मन की, जाने ना जाने कोई आई हैं आते आते होठों पे दिल की बातें. . क्योंकि ...
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तुम चुप थीं उस दिन.. पर वो आँखों में क्या था...? जो तनहा, नहीं सरगोशियाँ थीं, कई मंजरो की, तमाम गुजरे, पलों के...
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क्या से आगे क्या ? क्या से आगे क्या ? आक्षेप, पराक्षेप से भी क्या ? विशाल, व्यापक और विराट है क्या सर्वथा निस्सहाय ...
खूबसूरत सदा-ए-जज़्बात
ReplyDeleteDhanywad, ji ye jajbat hi kavya ka murt rup leti hai..
ReplyDeleteबहुत सुंदर और गहरा अहसास लिए हई रचना। बहुत खूब।
ReplyDeleteबहुत सुंदर और गहरा अहसास लिए हई रचना। बहुत खूब।
ReplyDeleteJi, dhanywad
Deleteशानदार लेखनी !
ReplyDeleteJi, pratikriya hetu abhar..
Deleteवेहतरीन भावों की वेहतरीन अभिव्यक्ति।
ReplyDeleteवेहतरीन भावों की वेहतरीन अभिव्यक्ति।
ReplyDeleteJi, pratikriya hetu abhar:)
Deleteजी नमस्ते,
ReplyDeleteआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार (25-11-2019) को "गठबंधन की राजनीति" (चर्चा अंक 3537) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित हैं….
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रवीन्द्र सिंह यादव
सुन्दर प्रस्तुति
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