शतरंजी चाल चलकर ...फिर हंसे
सत्त पर सवार होकर ..फिर हंसे
एक होने के चाल पे,डोलकर राजा जी,
सर से नख तक जाल बुनकर ..फिर हंसे।
घुम घाम कर वही आ गए...फिर हंसे
बुलंदी के मस्त,ताब तेवर में..फिर हंसे
हाय री कुर्सी!कैसा मोह मलंग ये हरबार,
उखाड लो, पछाड़ लो,कहकर..फिर हंसे।
रखकर गिरवी अपनी ही मिट्टी ..फिर हंसेये शाह!ये मात!ओ' महल बनाकर..फिर हंसेचले थे सियाने बन ,नयी कहानी लिखनेसत्ता के घोड़े पर सवार होकर..फिर हंसे।
ताल पे बवाल,ओ' ख्याल भी उसका..फिर हंसे
गजब के खेल में शामिल तख्त -ताज..फिर हंसे,
जो पूछे कोई हमसे तो कहे क्या 'तृप्ति' ?ये कहकर,' कुछ तो जरूर होगा', कहकर..फिर हंसे
पम्मी सिंह ' तृप्ति '✍️
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