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Jun 16, 2018

आपकी सरपरस्ती में संवर कर ..









पापा ..
यूँ तो जहां में फ़रिश्तों की फ़ेहरिस्त है बड़ी ,
आपकी सरपरस्ती  में संवर कर ही
ख्वाहिशों को जमीं देती रही

मगर अब..
 जरा बेताब है मन, घिरती हूँ  धूंधले साये से ,
हमारी तिफ़्ल - वश की ज़िद्द और तल्ख लहजों के गहराइयों को अब
हथेलियों के उष्ण में  हौसलों को तलाशती रही


आपकी बुजूर्गियत ने ही तो हमें बहलायें रखा
उम्मीद करती हूँ हर पल किसी फ़जल का
पर मगा़फिरत की बात पर आपको
हाथ छोड़ कर जाते देखती रही


खबर तो होगी फितरतें बदलता है आस्मां भी
भंवर में निखरना सिखाया हैं आपने ही
हमारे हक़ में था बस इरादा बदलना 
राह के पेचो खम से ग़ुज़रती पर संभलती रही..
©पम्मी सिंह✍

(तिफ़्ल - वश :बच्चों की तरह,फ़जल:कृपा, मगाफिरत:मोक्ष)

May 12, 2018

अर्श पे दर्ज एहकाम ..










ख्वाबों की जमीन तलाशती रही
अर्श पे दर्ज एहकाम की तलाश में कितनी रातें तमाम हुई

इंतजार, इजहार, गुलाब, ख्वाब, वफा, नशा
उसे पाने की कोशिशें तमाम हुई सरेआम हुई

कुछ तो रहा गया हममें जो जख्म की बातों पर मुस्कराते है
हर सुब्ह संवरता है मानों खिजां में भी फूलों की ऐहतमाम  हुई

जमाने की जद में हम कुछ और बढ गए
अब रक़ीबो  को एहतिराम करते कितनी 
सुब्हो- शाम हुई

लब सिल लिए अमन की खातिर
ज़रा सी सदाकत पर क्या चली मानो शहर में कोहराम  हुई।

           © पम्मी सिंह..✍


(एहकाम-आदेश, ऐहतमाम- व्यवस्था, अर्श-आसमान, एहतिराम-कृपा:आदर, ख़िजा-पतझड़, रक़ीब-प्रतिद्वंदी)

Apr 25, 2018

समीक्षा




काव्यकांक्षी , कवयित्री पम्मी सिंह की कविताओं का पहला संकलन होकर भी भाव और भाषा की दृष्टि से परिपूर्ण है। संकलन की कविताओं में भावना का प्रवाह और अनुभव की कसौटी दोनों ही देखने लायक है। तलाश कविता की पंक्तियां -स्वतंत्रता तो उतनी ही है हमारी जितनी लंबी डोर ! सहज ही स्त्री मन की विवशताओं को  साफगोई से चित्रित करती है, इसी प्रकार कई राह बदल कर, किताबों के चंद पन्ने, निशान धो डालें ,जैसे दर्जनों कविताएँँ हैं जो पाठक के मन -मस्तिष्क को झकझोरती  है। कवयित्री पम्मी सिंह के लगातार लेखन के लिए शुभेच्छा एवं
 'सुरसरि सम सब कहँ  हित होई ' 
की मंगल कामना है।

सुबोध सिंह शिवगीत
हिन्दी विभाग




मैंने पम्मी सिंह के काव्य संकलन "काव्यकांक्षी" की कविताओं को पढ़ा काव्य और शिल्प के स्तर पर कविताएं नयी है। ये हमारे जीवन की संवेदनाओं से जुड़ी है तथा समकालीन मानव - प्रवृत्तियों से  गहरे रूप से जुड़ी है । कवयित्री का अनुभव व्यापक है




पम्मी सिंह की कविताएँँ एक उभरती हुई काव्य प्रतिभा के अंतर्मन की सहज अभिव्यक्ति है। इन कविताओं में कवयित्री के स्वप्न और आकांक्षाओं का प्रगटीकरण बेहद ही सधे अंदाज में हुआ है। मैं पम्मी सिंह की कविता के प्रति समर्पण भाव को देखकर उनके भविष्य में सफलता के प्रति आशान्वित हूँँ।
    भरत यायावर
हिन्दी विभाग
बिनोबा भावे विश्वविद्यालय 

Mar 31, 2018

लफ्ज़ जो बयां ..



















लफ्ज़ जो बयां न हो सके
तन्हाइयों में मुखर हो जाता 

कोई है जो उसी मोड़ पर रुका
सलीके से हवाओं में खूशबू बिखेर जाता

कीमियागर है कई अनाम लम्हातों का
तन्हाइयों में रकाबत का रिश्ता भी निखर जाता 

रहगुज़र है तन्हा ,ग़म -ओ- नाशात का
इस अंधे शहर में जख्म फूलों की प्रखर जाता

लो आई है बहारे, जज़्ब हसरतों का
काविशों का मौसम में  शऊर जिंदगी का निखर जाता
पम्मी सिंह..✍



कीमियागर :रसायन विधा को जानने वाला
काविश: प्रयत्न, 
रहगुज़र :रास्ता, पथ
रकाबत: प्रति द्वंद्वी,प्रणय की प्रतियोगिता

Feb 16, 2018

जब डालती है ख्वाबों में खलल..




वाकिफ तो होेगें इस बात से..
इन पलकों पे कई सपने पलते हैं
उफ़क के दरीचों से झाँकती शुआएं
डालती है ख्वाबों में खलल..
जो अस्बाब है
गुजिश्ता लम्हों की, 
पर ये सरगोशियाँ कैसी?
असर है 
जो  एक लम्हें के लिए..
शबनमी याद फिर से मुस्कराता है
पन्ने है जिंदगी के..जिनसे
सूर्ख गुलाबों की खुशबू जाती नहीं,
जिक्र करते हैं ..
इन हवाओं से जब 
एक बूंद ख्यालों के
पलकों को नमी कर
फिर खलल डाल जाता है..
                                  पम्मी सिंह✍

उफ़क-क्षितिज,दरीचे-झरोखे,
शुआएं-किरणें,अस्बाब- कारण,वजह,
गुजिश्ता-बिती बात,



Feb 7, 2018

सुर्ख रंग बदलते नहीं..







जब..
छट जाएगी हर धुंध


आसमान की नीली क़बा पे

दिखेगें इन्द्रधनुषी रंग

बसारत कई खुश रंग की,

बसीरत की रंगों से

कहीं धूप , कहीं छांव है,

भागती जिंदगी की दोड़ में

क़ुर्बतों में  भी सुर्ख रंग बदलते नहीं

ताब है कई रंगों की 

हुनर है ,
संगतराशी की तो..

तुम एक इन्द्रधनुषी ख्वाब तो देखों,

ज़हन के कैनवास पे फिर

इक नई कलेवर  में निखर  ,

आज वो उम्मीद फिर मुस्कराता है ...
                                     पम्मी सिंह


बसारत- sight
बसीरत- Insightदूरदर्शिता

क़बा-चादर  apparel,garment
कुर्बत- नजदीक nearness, vicinity

Jan 18, 2018

बवाल..






सुर्खियों में बवाल भी बिकते हैं
जो इघर रुख करें..
तो दिखाए बवाल इनकी..
मुंसिफ की जमीर है 
सवालों के घेरों में 
हाकिम भी वही
मुंसिफ भी वही
सैयाद भी वही
शिकायत भी कि बरबाद भी वही,
सो बीस साल से पहले
जम्हूरियत के दम पे बवाल कर बैठै,
समय के साथ 
बदल लेते हैं लिहाज़
खोखले शोर की शय हर सिम्त 
मसीहा के नाम दोस्तों
सोची समझी..
ये कोई और खेल है
फकत सवाल है हमारी..
क्यूँ इस्तहारों के नाम पे 
आप बवाल  बेचते हैं?
               पम्मी सिंह..✍