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Jan 17, 2026

रेत सी जिंदगी..

 


रेत सी जिंदगी..


हमें ..

बड़ा वहम हो चला था कि

गांठे खुल गई 

भला ये कैसी सोच ?

मन की गांठ और ..

फितरत खुलने की ना ना ना

इल्म ही नहीं रहा उनके आधे अफसाने की,


खता मेरी इत्ती सी

हमने पूरे फसाने रख दिए 

सब निसार किए,

जो न आना था

सो भला क्यूकर आये ?


लम्हो का कोहरा

जो नागावर लगे पर 

रौशनाई लिए रहती न,

हल्की -हल्की ,जर्द -जर्द सी

उन लम्हो पे सांकल क्यू लगाये ?


किसी ने खूब कहा

ये दूरी, नजरअंदाजी,बेनियाजी 

उल्फ़त के ही अलग अंदाज है,

और हमे एहसास हुआ कि

फासले...बहुत नजदीक से ही

होकर तो गुजरती ..


सच ही है कि 

जिंदगी का निबाह ,

आधे से जादा हिस्सा 

भ्रम में पलती,बहती,

'शायद',काश!! 

कहते हुए,सोचते हुए..


देखते - देखते यूं ही

इक रोज

खत्म हुआ महसूस कराती ,

बेअवाज 

सिलसिला जाने पहचाने 

अक्सर हसरते खींच लाती,

फिर से गवाने के लिए ,

गवाने के लिए ।

पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '



Feb 4, 2017

संयोग..



कुछ शक्तियाँ विशाल व्यापक और विराट् है

जिसमें हम खुद को सर्वथा निस्सहाय पाते हैं
हाँ...वो 'संयोग ' ही है

जो हमारे वश से बाहर होती है
बादलों के चाँद,सितारें, राशियाँ और वो एक समय

न जाने ब्रह्मांड में छुपी तमाम शक्तियाँ..
मिलकर इक नयी चाल चलती .. जहाँ हम

चाह कर भी कुछ न कर सकने की अवस्था में पाते हैं तब..

.कुछ टूटे सितारों की आस में
हर रात छत से गुज़र जाती हूँ

आधे -अधूरे बेतरतीब इखरे-बिखरे
पलों,संयोग को समेटते हुए न जाने

कई संयोग वियोग में बदल ..
रह जाती है बस वही इक ...कसक

जी हाँ .. ये कसक

अजीब सी कशाकश की अवस्था
जब्त हो जाती है..
फिक्र पर भी बादल मडराते है,

कुछ सुनना था,जानना था या ...
.बस जरा समझना था
पर...

देखों यहाँ भी संयोग और समय ने अपनी
महत्ता बता दी...

हर जानी पहचानी शक्ल अचानक अज़नबी बन जाती है..

वाकिफ हूँ इस बात से

कुछ शक्तियाँ विशाल व्यापक और विराट् होती है..
                                                                             ©पम्मी सिंह'तृप्ति'      
                                                                           



रेत सी जिंदगी..

  रेत सी जिंदगी.. हमें .. बड़ा वहम हो चला था कि गांठे खुल गई  भला ये कैसी सोच ? मन की गांठ और .. फितरत खुलने की ना ना ना इल्म ही नहीं रहा उन...