रेत सी जिंदगी..
हमें ..
बड़ा वहम हो चला था कि
गांठे खुल गई
भला ये कैसी सोच ?
मन की गांठ और ..
फितरत खुलने की ना ना ना
इल्म ही नहीं रहा उनके आधे अफसाने की,
खता मेरी इत्ती सी
हमने पूरे फसाने रख दिए
सब निसार किए,
जो न आना था
सो भला क्यूकर आये ?
लम्हो का कोहरा
जो नागावर लगे पर
रौशनाई लिए रहती न,
हल्की -हल्की ,जर्द -जर्द सी
उन लम्हो पे सांकल क्यू लगाये ?
किसी ने खूब कहा
ये दूरी, नजरअंदाजी,बेनियाजी
उल्फ़त के ही अलग अंदाज है,
और हमे एहसास हुआ कि
फासले...बहुत नजदीक से ही
होकर तो गुजरती ..
सच ही है कि
जिंदगी का निबाह ,
आधे से जादा हिस्सा
भ्रम में पलती,बहती,
'शायद',काश!!
कहते हुए,सोचते हुए..
देखते - देखते यूं ही
इक रोज
खत्म हुआ महसूस कराती ,
बेअवाज
सिलसिला जाने पहचाने
अक्सर हसरते खींच लाती,
फिर से गवाने के लिए ,
गवाने के लिए ।
पम्मी सिंह ' तृप्ति '
ये नजरअंदाजी,बेनियाजी
ReplyDeleteउल्फ़त के ही अलग अंदाज है,
वाह
सुंदर
ReplyDeleteवाह-वाह शानदार नज़्म दी।
ReplyDeleteलिखती तो हैं ही पाठकों के लिए भी रचनाएं डाला कीजिए न।
सादर।
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नमस्ते,
आपकी लिखी रचना सोमवार १३ जनवरी २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
बहुत सुंदर
ReplyDeleteसहज अभिव्यक्ति।
ReplyDeleteबहुत अच्छी भावपूर्ण कविता. सादर अभिवादन
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