अनभिज्ञ हूँ काल से सम्बन्धित सारर्गभित बातों से , शिराज़ा है अंतस भावों और अहसासों का, कुछ ख्यालों और कल्पनाओं से राब्ता बनाए रखती हूँ जिसे शब्दों द्वारा काव्य रुप में ढालने की कोशिश....
शतरंजी चाल चलकर ...फिर हंसे सत्त पर सवार होकर ..फिर हंसे एक होने के चाल पे,डोलकर राजा जी, सर से नख तक जाल बुनकर ..फिर हंसे। घुम घाम कर वही...
रिश्तो को पकड़ने और जकड़ने की जद्दोज़हद शुरु हो जाती ..... पुन : शून्य से आरम्भ आहिस्ता आहिस्ता शाम की और कदम बढ़ती जाती ...अपनी जिंदगी समटने ,क़रीने से सजाने में।....लधु किन्तु भावपूर्ण लेखन , बधाई |
ReplyDeleteप्रतिक्रिया हेतु आभार,sir
ReplyDeleteदर्द और खुशी का समन्वय हि हमारे रिश्ते की पहचान ...
ReplyDelete...रिश्तों को बहुत सटीक रूप से परिभाषित किया है...बहुत सुन्दर और भावपूर्ण..
बहुत-बहुत धन्यवाद एवं आभार , sir
ReplyDeleteबेहद शानदार लेख। पम्मी जी, ब्लाग पर कमेंट करते वक्त नाम ईमेल के साथ अपना यूआरएल http://pammisingh.blogspot.in/ वेबसाइट वाले कॉलम में भर दिया कीजिए। इससे मैं सीधे आपके ब्लाग तक आसानी पहुंच सकूंगां। अभी तलाश करके पहुंचना पड़ता है।
ReplyDeleteजी,जरूर
ReplyDeleteप्रतिक्रिया हेतू घन्यवाद