अनभिज्ञ हूँ काल से सम्बन्धित सारर्गभित बातों से , शिराज़ा है अंतस भावों और अहसासों का, कुछ ख्यालों और कल्पनाओं से राब्ता बनाए रखती हूँ जिसे शब्दों द्वारा काव्य रुप में ढालने की कोशिश....
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रेत सी जिंदगी..
रेत सी जिंदगी.. हमें .. बड़ा वहम हो चला था कि गांठे खुल गई भला ये कैसी सोच ? मन की गांठ और .. फितरत खुलने की ना ना ना इल्म ही नहीं रहा उन...
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तुम चुप थीं उस दिन.. पर वो आँखों में क्या था...? जो तनहा, नहीं सरगोशियाँ थीं, कई मंजरो की, तमाम गुजरे, पलों के...
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क्या से आगे क्या ? क्या से आगे क्या ? आक्षेप, पराक्षेप से भी क्या ? विशाल, व्यापक और विराट है क्या सर्वथा निस्सहाय ...
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कई दिनों बाद ...थोड़ी सी सुकून और कलम...गानें के साथ हालत ये मेरे मन की, जाने ना जाने कोई आई हैं आते आते होठों पे दिल की बातें. . क्योंकि ...


रिश्तो को पकड़ने और जकड़ने की जद्दोज़हद शुरु हो जाती ..... पुन : शून्य से आरम्भ आहिस्ता आहिस्ता शाम की और कदम बढ़ती जाती ...अपनी जिंदगी समटने ,क़रीने से सजाने में।....लधु किन्तु भावपूर्ण लेखन , बधाई |
ReplyDeleteप्रतिक्रिया हेतु आभार,sir
ReplyDeleteदर्द और खुशी का समन्वय हि हमारे रिश्ते की पहचान ...
ReplyDelete...रिश्तों को बहुत सटीक रूप से परिभाषित किया है...बहुत सुन्दर और भावपूर्ण..
बहुत-बहुत धन्यवाद एवं आभार , sir
ReplyDeleteबेहद शानदार लेख। पम्मी जी, ब्लाग पर कमेंट करते वक्त नाम ईमेल के साथ अपना यूआरएल http://pammisingh.blogspot.in/ वेबसाइट वाले कॉलम में भर दिया कीजिए। इससे मैं सीधे आपके ब्लाग तक आसानी पहुंच सकूंगां। अभी तलाश करके पहुंचना पड़ता है।
ReplyDeleteजी,जरूर
ReplyDeleteप्रतिक्रिया हेतू घन्यवाद