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Aug 29, 2016

आसमान को और झुकना..

आसमान को और झुकना..


आसमान को और झुकना पड़ेगा

न जानू फिज़ाओ की आगोश की बातें..

ख्वाहिशों की मुरादो को पूरा करना पड़ेगा

छोड़ो आज़ खोने की बातें

पाने के हुनर की ज़िक्र करना पड़ेगा

जहर न बन जाउ पीते-पीते

अमृत की भी आस करना पड़ेगा

सहरा में सराबो से वास्ता सही..

अब्र की आस करना पड़ेगा

सरसब्ज़ की तलाश में

सदमात को भी वाज़िब करना पड़ेगा..
                              ©पम्मी सिंह 


(सहरा-रेगिस्तान ,सराबो-जल भ्रम,सदमात-आघात)


15 comments:

  1. आसमान को और झुकना पड़ेगा। बेशक ख्‍वाहिशें बहुत हैं, इसलिए झुकना तो पड़ेगा ही। बहुत ही सुंदर और यथार्थ को प्रस्‍तुत करती हुई रचना।

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    1. रचना पर अपने बहुमूल्य समय देने एवम् टिप्पणी पढकर खुशी हुई... बहुत बहुत शुक्रिया.

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  2. आसमान को और झुकना पड़ेगा। बेशक ख्‍वाहिशें बहुत हैं, इसलिए झुकना तो पड़ेगा ही। बहुत ही सुंदर और यथार्थ को प्रस्‍तुत करती हुई रचना।

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  3. बहुत खूब ... सब इच्छा शक्ति की बातें हैं ... आशावादी मन सब कुछ करने को आतुर रहता है ... पाने का हुनर मिल ही जाता है ...

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    1. रचना पर अपने बहुमूल्य समय देने एवम् टिप्पणी पढकर खुशी हुई... बहुत बहुत शुक्रिया.

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  4. बेहतरीन ग़ज़ल... उम्दा खयालात

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  5. कई बीज गिरे धरती पर बस कुछ ही उगे तो कुछ पौधे रह गये । तो कुछ बने पेड़ ।

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    1. Kya baat hai...badhiya panktiya
      Dhanywad khubsurat line ke liey..

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  6. वाह !!
    बहुत खूब

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  7. वाह! आपकी रचनाओ से रु ब रु होकर 'पाने के हुनर की ज़िक्र करना पड़ेगा'।बहुत उम्दा। और मुबारक हो सहरा में सराबों के संग अब्र की आस को।

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    1. आपका हार्दिक धन्यवाद आदरणीय, रचना पर टिप्पणी एवं सराहना हेतु आभारी हूँ।

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  8. कुशल चयन! बधाई!

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