अनभिज्ञ हूँ काल से सम्बन्धित सारर्गभित बातों से , शिराज़ा है अंतस भावों और अहसासों का, कुछ ख्यालों और कल्पनाओं से राब्ता बनाए रखती हूँ जिसे शब्दों द्वारा काव्य रुप में ढालने की कोशिश....
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बुलंदी के मस्त,ताब तेवर
शतरंजी चाल चलकर ...फिर हंसे सत्त पर सवार होकर ..फिर हंसे एक होने के चाल पे,डोलकर राजा जी, सर से नख तक जाल बुनकर ..फिर हंसे। घुम घाम कर वही...
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कई दिनों बाद ...थोड़ी सी सुकून और कलम...गानें के साथ हालत ये मेरे मन की, जाने ना जाने कोई आई हैं आते आते होठों पे दिल की बातें. . क्योंकि ...
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तुम चुप थीं उस दिन.. पर वो आँखों में क्या था...? जो तनहा, नहीं सरगोशियाँ थीं, कई मंजरो की, तमाम गुजरे, पलों के...
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💮💮 मौन है गर्जन है रत है विरक्त है शून्य है.. शब्द है पर खामोश है नत है .. हर ऊषा की प्रत्युषा ...

ये आशाओं के दीप ही दूर तक जाते हैं आशा प्रजव्लित रखते हैं मन में ...
ReplyDeleteभावपूर्ण ...
आभार।
Deleteये दीप प्रज्वलन सिर्फ़ दिये की बातीं ही नहीं
ReplyDeleteएक संकल्प संग उम्मीद की अलख जगाई है।...दीये की ज्योति के दिव्य दर्शन को दीपदीपाती प्रेरक पंक्तियाँ। विलक्षण विचार। आभार और बधाई।
Great readd
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