चित्राभिव्यक्ति रचना
सायली छंद
मासूम
निगहबान नजर
बढाती उम्मीदें, ख्वाहिशें
सीचती मेरी
जमीन।
पम्मी सिंह 'तृप्ति'
2.
जख्म
वजह बनी
प्रेरित करती आत्मशक्ति,
सुलझती रही
उलझनें।
अनभिज्ञ हूँ काल से सम्बन्धित सारर्गभित बातों से , शिराज़ा है अंतस भावों और अहसासों का, कुछ ख्यालों और कल्पनाओं से राब्ता बनाए रखती हूँ जिसे शब्दों द्वारा काव्य रुप में ढालने की कोशिश....
रेत सी जिंदगी.. हमें .. बड़ा वहम हो चला था कि गांठे खुल गई भला ये कैसी सोच ? मन की गांठ और .. फितरत खुलने की ना ना ना इल्म ही नहीं रहा उन...
वाह ...
ReplyDeleteसयाली छंद में लिखी रचनाएं लाजवाब हैं आपकी ...
बहुत खूब ...
शुभेच्छा संपन्न प्रतिक्रिया हेतु आभार।
ReplyDeleteलाजवाब !! बहुत सुंदर आदरणीया ।
ReplyDeleteदोनों छोटी कविताएँ दिल को छू जाती हैं। पहली में वो मासूम नज़र है, जो हमें बिना कुछ कहे हिम्मत दे देती है। जैसे कोई अपना हमें देखकर कह दे, “तुम कर लोगे।” ये बहुत सच्चा एहसास है। दूसरी कविता भी ज़िंदगी की हक़ीक़त बताती है। कई बार चोट लगने से हम टूटते नहीं, बल्कि और मज़बूत हो जाते हैं।
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