अनभिज्ञ हूँ काल से सम्बन्धित सारर्गभित बातों से , शिराज़ा है अंतस भावों और अहसासों का, कुछ ख्यालों और कल्पनाओं से राब्ता बनाए रखती हूँ जिसे शब्दों द्वारा काव्य रुप में ढालने की कोशिश....
Mar 22, 2016
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
चन्द किताबें तो कहतीं हैं..
दिल्ली प्रेस से प्रकाशित पत्रिका सरिता (फरवरी प्रथम) में छपी मेरी लेख "सरकार थोप रही मोबाइल "पढें। सरिता का पहला संस्करण 1945 में ...

-
डायरी 20/जून 24 इधर कई दिनों से बहुत गर्मी आज उमस हो रही। कभी कभार बादल पूरे आसमान को ढके हुए। 'सब ठीक है' के भीतर उम्मीद तो जताई...
-
तुम चुप थीं उस दिन.. पर वो आँखों में क्या था...? जो तनहा, नहीं सरगोशियाँ थीं, कई मंजरो की, तमाम गुजरे, पलों के...
-
कहने को तो ये जीवन कितना सादा है, कितना सहज, कितना खूबसूरत असबाब और हम न जाने किन चीजों में उलझे रहते है. हाल चाल जानने के लिए किसी ने पू...
बहुत सुंदर। आपको रंगोत्सव की बहुत बहुत शुभकामनाएं। पम्मी जी, आपके कई ब्लाग हैं। आप अपने कमेंट में अलग अलग यूआरएल भर कर कमेंट पोस्ट किया कीजिए। आपके अन्य ब्लाग पर पहुंचने में असानी हो जाएगी।
ReplyDeleteबहुत सुंदर। आपको रंगोत्सव की बहुत बहुत शुभकामनाएं। पम्मी जी, आपके कई ब्लाग हैं। आप अपने कमेंट में अलग अलग यूआरएल भर कर कमेंट पोस्ट किया कीजिए। आपके अन्य ब्लाग पर पहुंचने में असानी हो जाएगी।
ReplyDeleteजी, धन्यवाद
ReplyDelete