अनभिज्ञ हूँ काल से सम्बन्धित सारर्गभित बातों से , शिराज़ा है अंतस भावों और अहसासों का, कुछ ख्यालों और कल्पनाओं से राब्ता बनाए रखती हूँ जिसे शब्दों द्वारा काव्य रुप में ढालने की कोशिश....
Jan 31, 2016
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बुलंदी के मस्त,ताब तेवर
शतरंजी चाल चलकर ...फिर हंसे सत्त पर सवार होकर ..फिर हंसे एक होने के चाल पे,डोलकर राजा जी, सर से नख तक जाल बुनकर ..फिर हंसे। घुम घाम कर वही...
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कई दिनों बाद ...थोड़ी सी सुकून और कलम...गानें के साथ हालत ये मेरे मन की, जाने ना जाने कोई आई हैं आते आते होठों पे दिल की बातें. . क्योंकि ...
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तुम चुप थीं उस दिन.. पर वो आँखों में क्या था...? जो तनहा, नहीं सरगोशियाँ थीं, कई मंजरो की, तमाम गुजरे, पलों के...
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💮💮 मौन है गर्जन है रत है विरक्त है शून्य है.. शब्द है पर खामोश है नत है .. हर ऊषा की प्रत्युषा ...
छोटी किंतु दमदार और सार्थक रचना की प्रस्तुति। अच्छे लेखन के लिए शुभकामनाएं।
ReplyDeleteछोटी किंतु दमदार और सार्थक रचना की प्रस्तुति। अच्छे लेखन के लिए शुभकामनाएं।
ReplyDeleteप्रतिक्रिया हेतू आभार, सर धन्यवाद.
ReplyDeleteउम्दा रचना ।
ReplyDeleteआपके ब्लॉग को यहाँ शामिल किया गया है ।
ब्लॉग"दीप"
यहाँ भी पधारें-
"कवि की दशा (हास्य कविता)"
बहुत बहुत धन्यवाद,सर
ReplyDeleteबहुत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति..
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