Jan 28, 2026

बुलंदी के मस्त,ताब तेवर

 


शतरंजी चाल चलकर ...फिर हंसे

सत्त पर सवार होकर ..फिर हंसे

एक होने के चाल पे,डोलकर राजा जी,

सर से नख तक जाल बुनकर ..फिर हंसे।


घुम घाम कर वही आ गए...फिर हंसे

बुलंदी के मस्त,ताब तेवर में..फिर हंसे

हाय री कुर्सी!कैसा मोह मलंग ये हरबार,

उखाड लो, पछाड़ लो,कहकर..फिर हंसे।


रखकर गिरवी अपनी ही मिट्टी ..फिर हंसे

ये शाह!ये मात!ओ' महल बनाकर..फिर हंसे

चले थे सियाने बन ,नयी कहानी लिखने

सत्ता के घोड़े पर सवार होकर..फिर हंसे।

 

ताल पे बवाल,ओ' ख्याल भी उसका..फिर हंसे 
गजब के खेल में शामिल तख्त -ताज..फिर हंसे,
जो पूछे कोई हमसे तो कहे क्या 'तृप्‍ति' ?

ये कहकर,' कुछ तो जरूर होगा', कहकर..फिर हंसे

पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '✍️






Jan 17, 2026

रेत सी जिंदगी..

 


रेत सी जिंदगी..


हमें ..

बड़ा वहम हो चला था कि

गांठे खुल गई 

भला ये कैसी सोच ?

मन की गांठ और ..

फितरत खुलने की ना ना ना

इल्म ही नहीं रहा उनके आधे अफसाने की,


खता मेरी इत्ती सी

हमने पूरे फसाने रख दिए 

सब निसार किए,

जो न आना था

सो भला क्यूकर आये ?


लम्हो का कोहरा

जो नागावर लगे पर 

रौशनाई लिए रहती न,

हल्की -हल्की ,जर्द -जर्द सी

उन लम्हो पे सांकल क्यू लगाये ?


किसी ने खूब कहा

ये दूरी, नजरअंदाजी,बेनियाजी 

उल्फ़त के ही अलग अंदाज है,

और हमे एहसास हुआ कि

फासले...बहुत नजदीक से ही

होकर तो गुजरती ..


सच ही है कि 

जिंदगी का निबाह ,

आधे से जादा हिस्सा 

भ्रम में पलती,बहती,

'शायद',काश!! 

कहते हुए,सोचते हुए..


देखते - देखते यूं ही

इक रोज

खत्म हुआ महसूस कराती ,

बेअवाज 

सिलसिला जाने पहचाने 

अक्सर हसरते खींच लाती,

फिर से गवाने के लिए ,

गवाने के लिए ।

पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '



बुलंदी के मस्त,ताब तेवर

  शतरंजी चाल चलकर ...फिर हंसे सत्त पर सवार होकर ..फिर हंसे एक होने के चाल पे,डोलकर राजा जी, सर से नख तक जाल बुनकर ..फिर हंसे। घुम घाम कर वही...