मैं नारी
खोज रही अस्तित्व को
हर उम्र ,
खोज रही अस्तित्व को
हर उम्र ,
हर पड़ाव को लांघते
बाहर के अंधेरे से बचते
तो गुम होती
भीतर के स्याह घेरे में
ये कौन सा आसेब ?
जो टिका है, नाभि के नीचे
जो जकड़ लेता है
बाहर के अंधेरे से बचते
तो गुम होती
भीतर के स्याह घेरे में
ये कौन सा आसेब ?
जो टिका है, नाभि के नीचे
जो जकड़ लेता है
मेरे वजूद को
सहमता हर रोज सन्नाटें में
बना क्यूँ है
सहमता हर रोज सन्नाटें में
बना क्यूँ है
कमजोर सृजन अंग
आबरू की डोर, ममत्व के संग
क्यूँ इसके हीं इर्द-गिर्द बुनी
आबरू की डोर, ममत्व के संग
क्यूँ इसके हीं इर्द-गिर्द बुनी
हमारी मयार्दा,
भीतर का शहर जब भी उजड़ा
क्यूॅऺ अट्टहास की पात्र बनी !
नीति-रीति भी बनी बेकसी
और फैली है
भीतर का शहर जब भी उजड़ा
क्यूॅऺ अट्टहास की पात्र बनी !
नीति-रीति भी बनी बेकसी
और फैली है
बहुत बदकारियां,
और कुछ बेशर्म
सृजन तंत्र से ही
और कुछ बेशर्म
सृजन तंत्र से ही
ढूंढ रहे पदचिह्न
मैं नारी
खोज़ रही अस्तित्व को..
अर्श से फर्श तक
झुका है आसमां भी
जब अमाल ही सवाल बनी,
तो मै नारी
खोज रही अस्तित्व को...
©पम्मी सिंह: ✍
आसेब: कष्ट/हानि
बदकारियां: कुकर्म
अमाल:आचरण
बेकसी:असहायता

निशब्द हूँ आपके भावों के समक्ष .गहरी भावाभिव्यक्ति.
ReplyDeleteआपके भाव भीने शब्दों से अभिभूत हूँ
Deleteधन्यवाद
वाह्ह...बेहद सारगर्भित, हृदयस्पर्शी, समसामयिक रचना पम्मी जी।
ReplyDeleteये कौन सा आसेब ?
जो टिका है...नाभि के नीचें
जो मेरे वजूद को जकड़ लेता,
सहमा है आज सन्नाटा भी
सृजन अंग बना क्यूँ कमजोर है
बेहद उम्दा पंक्तियाँ..👌👌👌
आपकी सस्नेह विचार और टिप्पणी स्वागत योग्य है
Deleteधन्यवाद
भीतर के स्याह घेरे में
ReplyDeleteये कौन सा आसेब ?..... इंसानी जिस्मों में जकड़ी शैतानी रूहों को झकझोरते सवाल!!! बहुत उम्दा रचना!!
आपकी विद्वतापूर्ण टिप्पणी के लिये आभार
Deleteबहुत सुंदर
ReplyDeleteआपकी अतुलनीय उत्साहवर्धन एवम् मार्गदर्शन हेतु धन्यवाद।
Deleteवाह!!पम्मी जी ,बहुत खूबसूरत ःः
ReplyDeleteआपकी अतुल्य टिप्पणी के लिये तहेदिल से शुक्रिया।
Deleteबहुत गहरी और विचारणीय रचना।
ReplyDeleteस्वयम का आत्ममंथन करती
और ढूंढ़ती अपने वजूद को
सोचने पर विवश करती सार्थक रचना
शुभेच्छा सम्पन्न प्रतिक्रिया हेतु हृदयतल से आभार ।
Deleteबना क्यूँ है कमजोर सृजन अंग
ReplyDeleteआबरू की डोर, ममत्व के संग
क्यूँ इसके हीं इर्द-गिर्द बुनी
भीतर का शहर जब भी उजड़ा--- बहुत ही गहरी प्रतीकात्मक पंक्तियाँ प्रिय पम्मी जी
सचमुच आज शिक्षित समाज के असभ्य चेहरों से डरी नारी शक्ति को इन प्रश्नों से दो चार होना पड़ रहा है | देहलोलुप वहशियों के आतंक से नारी के वजूद पर ग्रहण लगने को है | विचारणीय रचना | सस्नेह --
शुभेच्छा सम्पन्न विस्तृत एवम् काव्यात्मक प्रतिक्रिया हेतु हृदयतल से आभार।
Deleteखुद के ऊपर तोहमत के साधन खुद जुटाती सदियों से क्या क्षितिज की लुप्त रेखा है नारी ।
ReplyDeleteबेहद गहरी अंतर तक उतरती रचना ।
बस इतना और
फर्श से अर्श नही अर्श से फर्श ।
आपकी विद्वतापूर्ण टिप्पणी सलाह के लिये आभार
Deleteआदरणीय / आदरणीया आपके द्वारा 'सृजित' रचना ''लोकतंत्र'' संवाद मंच पर 'सोमवार' २३ अप्रैल २०१८ को साप्ताहिक 'सोमवारीय' अंक में लिंक की गई है। आमंत्रण में आपको 'लोकतंत्र' संवाद मंच की ओर से शुभकामनाएं और टिप्पणी दोनों समाहित हैं। अतः आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/
ReplyDeleteटीपें : अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार, सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।
निमंत्रण
विशेष : 'सोमवार' २३ अप्रैल २०१८ को 'लोकतंत्र' संवाद मंच अपने साप्ताहिक सोमवारीय अंक में दो अतिथि रचनाकारों आदरणीय सुशील कुमार शर्मा एवं आदरणीया अनीता लागुरी 'अनु' का हार्दिक स्वागत करता है। अतः 'लोकतंत्र' संवाद मंच आप सभी का स्वागत करता है। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/
जी,धन्यवाद।
Deleteसचमुच कमाल का सृजन है।
ReplyDeleteआपकी उत्साहवर्धक टिप्पणी के लिये आभार।
DeleteTrue commotions &pain of women's heart
ReplyDeleteHeart touching
शुभेच्छा सम्पन्न प्रतिक्रिया हेतु हृदयतल से आभार ।
Deleteभीतर के स्याह घेरे में
ReplyDeleteये कौन सा आसेब ?
जो टिका है, नाभि के नीचे
जो जकड़ लेता है मेरे वजूद को
सहमता हर रोज सन्नाटा में
बहुत ही हृदयस्पर्शी ,बेहतरीन एवं लाजवाब प्रस्तुति
वाह!!!!
शुभेच्छा सम्पन्न प्रतिक्रिया हेतु हृदयतल से आभार ।
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