अनभिज्ञ हूँ काल से सम्बन्धित सारर्गभित बातों से , शिराज़ा है अंतस भावों और अहसासों का, कुछ ख्यालों और कल्पनाओं से राब्ता बनाए रखती हूँ जिसे शब्दों द्वारा काव्य रुप में ढालने की कोशिश....
Mar 24, 2017
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चन्द किताबें तो कहतीं हैं..
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शउर नहीं कि खुद को समझाउँ
ReplyDeleteशायद इतनी समझदार भी नहीं......वाह!
यह प्रतिक्रिया मिलना मेरी रचना का सम्मान है।धन्यवाद..
Deleteहर शख्स मिला
ReplyDeleteचेहरे पर चेहरा लगाए.
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पर वो इंसान का चेहरा नहीं मिला
वाह ! बहुत खूब पंक्तियाँ
यह प्रतिक्रिया मिलना मेरी रचना का सम्मान है।धन्यवाद..
Deletebahut achchi kavita... badhai aur shubhkamnayen
ReplyDeleteयह प्रतिक्रिया मिलना मेरी रचना का सम्मान है।धन्यवाद..
Deleteआज का सच तो यही है ... कई कई मुखौटे हैं इंसान के चेहरे पर ... अब तो वो भी भूल गए हैं अपना चेहरा ... अच्छा लिखा है बहुत ही ...
ReplyDeleteयह प्रतिक्रिया मिलना मेरी रचना का सम्मान है।धन्यवाद..
Deleteजब बेहरुपिए से इक मुखौटा मांग कर,
ReplyDeleteगिरती हूँ बस
इन शतरंजी चाल से
शउर नहीं कि खुद को समझाउँ
शायद इतनी समझदार भी नहीं..
बहुत ही सुन्दर रचना.....
मुखौटा लगाए इंसान को पहचानना मुश्किल ही है
रचना पढने व उत्साहवर्धन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद,
सादर आभार.
बहुत प्रभावपूर्ण रचना......
ReplyDeleteमेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपके विचारों का इन्तज़ार.....
रचना पढने व उत्साहवर्धन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद,
सादर आभार.
मुखौटे बच्चों को अधिक प्रिय होते हैं। बाल मन दूसरों को खेल -खेल में चकमा देकर प्रसन्न होता है लेकिन जब हम ज़िन्दगी की भीड़ में मुखौटों का सामना करते हैं तो मन विचलित होकर भ्रम और सच्चाई पर मनन करता है और मुखौटे के पीछे छुपी असलियत को जानकर हिक़ारत भरी नज़र से देखता है।
ReplyDeleteबहुत बेहतरीन भावाभियक्ति ,बधाई पम्मी जी। आपकी नवीनतम रचना का इंतज़ार है।