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Jun 15, 2017

फितूर है..ये,




फितूर है..ये,  
कई दफा सोचती हूँ.. बड़ा अच्छा होता जो 'मैं' तुम्हारे 
किरदार में होती..

मैं तुम होती और मेरी जगह तुम..
और ...मैं नाहक जरा -जरा बात पे चिल्लाती, बोलती..
कुछ भी कर गुज़र जाती और..
 तुम चुपचाप सुन लेते..

गिरा कर कुछ खारे मोती. 
सफ्हों में खुद को तलाशते,

मैं..चुपके से देखती..
अनदेखी कर 
तुम क्या कर रहे हो..
.
शिलाओं के माफिक बन 
सबको समझती रहती..

जी,.. ये फितूर ही तो है..
जो सोची.. सोच सोचकर फिर सोची,
क्या?तुम म़े भी वो हुनर होगा..

जिससे खामोश लफ्ज़ों को पढा करते है....

लो..ये सोच फिर चली...
बेजा़र सी पांव पटक पटक कर..
और मैं!.. 
आराम कुर्सी पर
फितूर सोच, 
नींद से बोझिल पलकें...
जो खुली 'संजू' की आवाज़ ..
"बीसन जूता मरबै और एक गिनबै"

(संजू गृह सहायिका अपनी बच्ची को धमकाने 
के लिए अक्सर बोल जाती)

मुस्कराहटों को लबों पर लाकर बोली
हाँ..जी फितूर है..

बाम पर चाँदनी ने भी  दस्तक दी है..
'वो' भी  दफ्तर से आने वाले है '
मुझे भी अपनी पाक कला को आज़माना है...

ये फितूर भी  न  ...कहाँ से कहाँ तक ले जाती...



                                                                   पम्मी

(काल्पनिक  उड़ान .)


May 25, 2017

सुंदर शब्द माँ..









       हृदयविदारक दृश्य

मृत मां जाते जाते भी बच्ची को सीने से चिपका कर रखी .

फलक  पर  लिखा  सुंदर  शब्द  माँ  को  चरितार्थ  करती  ये  तश्वीर 

 निशब्द  कर  देती  है। विधाता   क्या  ऐसा  दिन  भी 


दिखाता  है।  जाते - जाते  भी  बच्चे  की  पेट  भर  गई  और  वो  मासूम  बच्ची..

..
क्या  कहूँ।   विधाता  अगर  दिल  में  नहीं  तो  कहां  है  तू।

May 19, 2017

इन्सान में अख्यात खुदा..




न जाने क्यूँ

हम खुद की ख्यालात लिए फिरते हैं कि

हर इन्सान में अख्यात खुदा बसता है

तो वो जो इन्सान है ,इन्सान में कहाँ रहता है?

जिनकी अलम होती शफ़्फाफ़ की

कश्तियाँ न कदी डगमगाई होगीं,

यहाँ हर शख्स कशिश में भी

सोने को हिरण में ढूंढ रहा

क्या पता जाने कहाँ है ?

वो इन्सान जिसमें खुदा होगा..

शायद..

वो जो खाली मकान है मुझमें,

वहाँ इन्सान में खुदा रहता होगा..

इस लिए 'वो 'सदाकत से गुम है,बुत है

खामोशी से फकत निगाह-बाह करता है..

हम खुद की ख्यालात.......
                                  ©पम्मी सिंह

Apr 28, 2017

शनासाई सी ये पच्चीस..


ये है हमारी रूदाद..

शनासाई सी ये पच्चीस वर्ष शरीके-सफर के साथ


सबात लगाते हुए


असबात कभी अच्छी कभी बुरी की..


ताउम्र बेशर्त शिद्दत से निभाते रहे..


सोचती हूँ ये जिंदगी रोज़ नई रंगो में ढलती क्यूँ हैं..

कई दफ़ा कहा..


कभी इक रंग में ढला करो..


गो एक हाथ से खोया तो दूसरे से पाया


हादिसे शायद इस कदर ही गुज़र जाती है..


शादाबों का मलबूस पहन


तरासती हूँ उस उफक को जो धूंध से परे हो..


मामूल है ये जिंस्त हर ख्वाब-तराशी के लिए


सबब है उल्फत की जिनमें सराबोर है चंद


मदहोशियाँ,सरगोशियाँ,गुस्ताखियाँ और बदमाशियाँ


वाकई.. पर मौत को वजह नहीं बनाने आई हूँ।

                                                             ©पम्मी सिंह 
                                                                  

(रूदाद-story,शनासाई-acquaintances,

सबात-stability,असाबात-दावा,गो-यद्यपि
शादाबों-greenblooming,मलबूस-पोशाक dress,उफक-क्षितिज, मामूल-आशावादी,सबब-कारण, उल्फत-प्रेम)

http://www.bookstore.onlinegatha.com/bookdetail/368/kavya-kanchhi.html

Apr 24, 2017

विमोचन समारोह


जी,नमस्कार

मैं आप सब के साथ एक खुशी साझा कर रही हूँ मेरी

पहली काव्य संग्रह 'काव्यकांक्षी' की पुस्तक विमोचन
समारोह दिनांकः 19 अप्रैल 2017 को (सेल ऑफिसर वाइफ एसोसिएशन) स्कोप मिनार ,लक्ष्मी नगर,
 नई दिल्ली में हुई..

मेरे लिए यह निसंदेह रोमांचित करनेवाला क्षण जो मुझे w/o SAIL chairman
श्रीमती आरती सिंह एवम् गणमान्य जनो की उपस्थिति में प्राप्त हुआ।

इस किताब में जिंदगी की तमाम पहलुओं को छूती हुई रचनाएँ है।

वो कहते है न...
हमारे होने और बनने में कई लोगों के
 साथ-साथ भावों और अहसासों का सहयोग रहता है।
आप इसे पढे तो बस मुस्करा के..
साथ ही अपनो को और मुझे (किताब) याद के साथ साझा जरूर करें।
धन्यवाद।

http://www.amazon.in/dp/9386163098

http://www.bookstore.onlinegatha.com/bookdetail/368/kavya-kanchhi.html

Mar 24, 2017

इक मुखौटा



सोचती हूँ खूबसूरत कहूँ या कुछ और

हर शख्स मिला

चेहरे पर चेहरा लगाए.
.
पर वो इंसान का चेहरा नहीं मिला

हर हँसी के पीछे

एक और हँसी

रही कसर हुई पूरी...

जब बेहरुपिए से इक मुखौटा मांग कर,

गिरती हूँ बस

इन शतरंजी चाल से

शउर नहीं कि खुद को समझाउँ

शायद इतनी समझदार भी नहीं..
                                               पम्मी


Mar 7, 2017

महिला दिवस

यह एकदिन की इज़्ज़त कुछ अच्छी नहीं लगती

 बात समानता की हो तो बात कुछ और होती

प्रतीक्षा उस दिन की,जब अंतराष्ट्रीय

'समानता दिवस' का आगाज़ हो...
                                          पम्मी 

Feb 24, 2017

बस यहीं हूँ..



हूँ ..

बस  यहीं  हूँ..


कहीं  और  नहीं  जरा  भंवर  में  पड़ी  हूँ...


दरपेश  है आसपास  की  गुज़रती   मसाइलो  से


गाहे  गाहे  घटती  मंजरो  को  देख,


खुद  के  लफ्ज़ों  से  हमारी  ही  बगावत  चलती  है


गो  तख़य्युल  के  साथ-साथ  लफ़्जों  की  पासबानी  होती  है,  


कुछ  खास  तो  करती  नहीं.. .पर


खुद  बयानी  सादा-हर्फी  पर  हमारी  ही  दहशत  चलती  है,


क्या  करु...


खिलाफ़त  जब  आंधियाँ  करती  है  तो  जुरअत  और    बढती  है। 

                                                                                             ©पम्मी सिंह  

(दरपेश -सामने,   मसाइलो -मुसिबत,  तख़य्युल -विचारो, ,पासबानी-पहरेदारी,जुरअत-हौसला )




                                                                                                       

                                

Feb 4, 2017

संयोग..



कुछ शक्तियाँ विशाल व्यापक और विराट् है

जिसमें हम खुद को सर्वथा निस्सहाय पाते हैं

हाँ...वो 'संयोग ' ही है

जो हमारे वश से बाहर होती है

सितारें, राशियाँ और समय

 न जाने ब्रह्मांड में छुपी तमाम शक्तियाँ..

मिलकर इक नयी चाल चलती .. जहाँ हम

चाह कर भी कुछ न कर सकने की अवस्था में पाते हैं

तब.
.
कुछ टूटे सितारों की आस में

हर रात छत से गुज़र जाती हूँ

आधे -अधूरे बेतरतीब इखरे-बिखरे

पलों,संयोग को समेटते हुए न जाने

कई संयोग वियोग में बदल ..
.
रह जाती है बस वही इक ...कसक

जी हाँ .. ये कसक

अजीब सी कशाकश की अवस्था

जब्त हो जाती है..

कुछ सुनना था,जानना था या ...
.
बस जरा समझना था

पर...

देखों यहाँ भी संयोग और समय ने अपनी

महत्ता बता दी...

हर जानी पहचानी शक्ल अचानक अज़नबी बन जाती है..

वाकिफ हूँ इस बात से

कुछ शक्तियाँ विशाल व्यापक और विराट् होती है..
                                                                             ©पम्मी सिंह       
                                                                           




Jan 18, 2017

क्या से आगे क्या ?

क्या से आगे क्या ?


क्या से आगे क्या ?

आक्षेप, पराक्षेप से भी क्या ?

विशाल, व्यापक और विराट है क्या

सर्वथा निस्सहाय नहीं है ये क्या

उपायो में है जबाब हर क्या का
,
छोड़ो भी..

प्रश्न के बदले प्रश्न को

लम्हो की खता वर्षो में गुज़र जाएगी..

पत्थरो को तराश कर ही बनती है,

जिन्दगी के क्या का जबाब.