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Jun 18, 2016

वो बोल...

आहटे नहीं है
उन दमदार कदमों के चाल की,
गुज़रती है जेहन में ..
वो बोल
मैं हूँ न..
तुमलोग घबराते क्यों हो ?’
वो सर की सीकन और जद्दोजहद,
हम खुश रहे..
ये निस्वार्थ भाव कैसे ?
आप पिता थे..
अहसास है अब भी
आपके न होकर भी होने का
गुंजती है..
तुमलोग को क्या चाहिए ?
पश्चताप इस बात
न पुछ सकी
आपको क्या चाहिए..
इल्म भी हुई जाने के बाद,
एनको के पीछे
वो आँखें नहीं
पर दस्तरस है आपकी 
हमारी हर मुफ़रर्त में..
                 ©पम्मी 

                  
                

                

9 comments:

  1. वाह पम्मीजी, आंख में आँसू आ गये, ऐसी आई पिता की याद।

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    1. प्रतिक्रिया हेतु आभार...

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    1. प्रतिक्रिया हेतु आभार..

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  3. http://hradaypushp.blogspot.in/2009/11/gagan.html

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  4. पिता की यादें किस तरह संजीदा होकर एक काव्‍य रचना के रूप में प्रस्‍तुत हुईं और हम सभी को इन यादों से रूबरू होने का अवसर मिला, एक पिता को समर्पित बहुत ही अच्‍छी काव्‍य रचना। अच्‍छी और संजीदा रचना देनेे के लिए आपका आभार।

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  5. प्रतिक्रिया हेतु आभार..

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  6. महज़ रचना नही,दस्तावेज़ दिल का!'मुफरर्त' शब्द फिर हमारी दस्तरस से बाहर!सलाम आपके अल्फ़ाज़ों को!!!

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  7. बस अक्सर यही होता है ... जब पाक पिता से पूछने का पता चलता है समय निकल जाता है ... गहरे एहसास लिए रचना ...

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